नाव सरकारी, पतवार बच्चों के हाथ! बाढ़ में ‘राहत’ के नाम पर खानापूर्ति का खेल?

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तौफीक की मड़ैया में जिंदगी दांव पर—तेज बहाव के बीच महिलाएं और किशोरियां चला रहीं नाव, जिम्मेदारों की कार्यप्रणाली पर उठे गंभीर सवाल

अमृतपुर/फर्रुखाबाद/ बाढ़ की विभीषिका झेल रहे तौफीक की मड़ैया गांव में सरकारी राहत व्यवस्था की तस्वीर ने जिम्मेदारों की कार्यप्रणाली पर गंभीर सवाल खड़े कर दिए हैं। ग्रामीणों का आरोप है कि गांव में सरकारी नाव तो उपलब्ध है, लेकिन उसे चलाने के लिए निर्धारित नाविक मौके पर नजर नहीं आता। हालात ऐसे हैं कि ग्रामीणों को अपनी जान जोखिम में डालकर खुद ही नाव की पतवार संभालनी पड़ रही है।

सबसे चिंता की बात यह है कि बच्चों के हाथों में किताब-कॉपियों की जगह नाव की पतवार दिखाई दे रही है। वहीं महिलाएं और किशोरियां भी तेज बहाव के बीच नाव चलाकर आवागमन करने को मजबूर हैं। बाढ़ के पानी में मामूली चूक भी जानलेवा साबित हो सकती है, बावजूद इसके ग्रामीणों का कहना है कि उन्हें कोई दूसरा विकल्प उपलब्ध नहीं कराया गया है।

नाविक की गैरमौजूदगी ने खड़े किए कई सवाल

ग्रामीणों के बीच सबसे बड़ा सवाल यही है कि जब सरकारी नाव के संचालन के लिए नाविक की व्यवस्था की गई है तो वह मौके पर क्यों नहीं है? यदि नाविक की ड्यूटी लगाई गई है और उसके नाम पर भुगतान भी किया जाता है, तो उसकी मौके पर मौजूदगी का सत्यापन कौन करता है? क्या संबंधित अधिकारी नियमित रूप से नाविकों की उपस्थिति और ड्यूटी का भौतिक सत्यापन करते हैं या कागजी कार्रवाई तक ही व्यवस्था सीमित है?

ग्रामीणों का कहना है कि बाढ़ जैसी आपदा के दौरान नाव केवल आवागमन का साधन नहीं बल्कि लोगों की जिंदगी बचाने का महत्वपूर्ण माध्यम है। ऐसे में प्रशिक्षित नाविक के बिना नाव का संचालन कराना बेहद जोखिम भरा है।

बच्चों और महिलाओं के हाथ पतवार, जिम्मेदारों की निगरानी पर सवाल

तौफीक की मड़ैया में सामने आई स्थिति राहत व्यवस्था की जमीनी हकीकत पर सवाल खड़े कर रही है। जिन बच्चों को इस समय सुरक्षित माहौल में रहना और पढ़ाई करनी चाहिए, वे मजबूरी में नाव चलाते नजर आ रहे हैं। महिलाएं और किशोरियां भी तेज धारा के बीच नाव संभाल रही हैं। ऐसे में यदि नाव अनियंत्रित होकर पलट जाए या कोई अप्रिय घटना हो जाए तो इसकी जिम्मेदारी किसकी होगी?

ग्रामीणों ने मांग की है कि गांव में तत्काल प्रशिक्षित और जिम्मेदार नाविक की तैनाती की जाए। साथ ही नाविक की ड्यूटी, उपस्थिति और भुगतान का मौके पर भौतिक सत्यापन कराया जाए। यदि कागजों में नाविक की तैनाती और भुगतान दर्शाया जा रहा है, लेकिन वास्तविकता में वह मौके पर मौजूद नहीं है, तो पूरे मामले की जांच कर जिम्मेदारी तय की जानी चाहिए।

हादसा हुआ तो कौन होगा जिम्मेदार?

बाढ़ के तेज बहाव के बीच बिना प्रशिक्षित व्यक्ति के नाव चलाने की स्थिति किसी बड़े हादसे को न्योता दे सकती है। ग्रामीणों का कहना है कि राहत के नाम पर केवल नाव उपलब्ध करा देना पर्याप्त नहीं है, बल्कि उसके सुरक्षित संचालन की जिम्मेदारी भी प्रशासन को सुनिश्चित करनी चाहिए।

अब देखना यह है कि तौफीक की मड़ैया में सामने आई इस तस्वीर को प्रशासन कितनी गंभीरता से लेता है और नाविक की गैरमौजूदगी के आरोपों की जांच कर जिम्मेदारों पर कार्रवाई होती है या फिर बाढ़ की इस गंभीर समस्या पर भी कागजी खानापूर्ति ही जारी रहती है।

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